शनिवार, 12 मार्च 2011

श्रीबालासुन्दरीदेवीशक्तिपीठ

एक विशाल तलब के किनारे इस्थित इस माँ त्रिपुर बाला सुन्दरी देवी के सुन्दर मंदिर के बारे मैं पुरानो मैं बताया जाता है की जिस समय भगवान् शिव प्रिय सती के पिता नर्प  प्रजापति   के  यहाँ अश्व मेघ यग्य   का आयोजन था तो उस यग्य मैं दक्स ने भगवान् ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश और ऋषियों को तो बुलाया था लेकिन उन्होंने अपने दामाद शिव को यग्य का आमंतरण नहीं भेजा क्योकि उनकी नजर  मैं कपाल्धारी होने   के  कारन वे यग्य मैं भाग लेने  के   योग्य नहीं थे .पिता   के घर मैं यग्य आमंत्रित नहीं किये जाने पर भी सती ने शिव से पिता    के  यग्य मैं जाने की अनुमति मांगी तो भगवान् शिव ने उन्हें संजय की देवी आपके पिता मेरे द्रोही हो गए है इसलिए उन्होंने हमें यग्य का आमंतरण नहीं भेजा और जो लोग बिना बुलाये जाते है वे कभी आदर नहीं पाते .जो मिर्त्यु से भी ज्यादा दुक्दायी  होता है इसलिए मुझे और आपको वहा नहीं जाना चाहिए
 भगवान् शिव   के कहने पर सती नाराज  होकर  बोली की संभो .आप सबके इश्वर है जिनके जाने से यग्य सफल होता है ,उन्ही आपको मेरे दुसट  पिता ने इस सुभाव्सर पर नहीं बुलाया है .इस दुरात्मा का आखिर क्या अभिप्राय है यह जानने   के लिए  ही मैं वहां जाना चाहती हूँ इसलिए नाथ मुझे आप वहा जाने की आज्ञा दे .
            इस प्रकार सटी ने भगवान् शिव से पिता  दक्स के यहाँ जाने की आज्ञा प्राप्त  की और वे नंदी पर सवार होकर एक महारानी  के अनुसार राजोप्सार ले बहुसंक्य परमार्थगनों  के साथ पिता   के यहाँ गयी .लेकिन वहा पहुचते ही पिता ने परमेश्वरी   के सामने परमेश्वर की घोर निंदा की तो dax कन्या सती को अपने वहा आने पर  बड़ा दुःख हुआ और   के दुर्वचन सुनकर वे कुपित हो उठी और उनका चित्त योगमार्ग मैं स्थित हो गया और अब उन्हें पति के चरणों के आलावा कुछ बी नहीं दिख रहा था .तब सति का निष्पाप शारीर तुरंत गिर पड़ा और उनकी इच्छानुसार उनका शरीर तत्काल योग  अग्नि मैं जल उठा .और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए .
      इस अनहोनी पर वहा आये  देव्त्ताओ  और रिसियो ने हाहाकार किया जो की कुछ ही सनो मैं प्रत्वी ,आकाश मैं चहू और फेल गया .तब महा प्रलय की आशंका से रिशी मुनि थर थर कापने लगे .भगवान् शिव को जब यह पता चला तो क्रोदाग्नी से उनका तीसरा नेत्र खुलकर रक्त रंजित हो उठा और नटराज का महा तांडव आरम्भ होने से तीनो लोको मैं हाहा कार मच गया .निसचित प्रलय का आभाश होने  लगा तो देवताओं ने भगवान् विष्णू की स्तुति आरम्भ की जिससे भगवान् रूद्र की क्रोध अग्नि से बचा जा सके .तब तक रूद्र गनों ke साथ नायक वीरबद्रा भगवान् रूद्र की आगया से नर्प  प्रजापति की यज्ञ शाला पहुचे तब शिव गनों और देवताओं   के  मध्य   भीषण युद्ध हुआ .रूद्र की सेना भीषण प्रहारों को देवता सहा नहीं सके और अलग अलग होकर देवलोक मैं चले गए .ऐसी विषम परिस्थति मैंनर्प  प्रजापति सव्जन वत्सल विष्णु   के  चरणों मैं नतमस्तक होकर इस भीषण नर्स्संहार को टालने की प्रार्थना करने लगे .परन्तु नर्प  प्रजापति महादेव   के  कोप से बच न सके. और भूतेश्वर   के  कोप का भजन नर्प  प्रजापति सहित   उनकी सेना को बनना ही पड़ा .
            भगवान् हरी ने युक्ति कर कुपित भगवान् भोले का क्रोध शांत किया और  नर्प  प्रजापति को जीवन दान देकर उन्हें पुनह जीवित करने की अनुनय विनय की .तो भोले ने बकरे का शिर काटकर नर्प  प्रजापति के  लगाकर उन्हें नया जीवन दान दिया .क्योकि भगवान् रूद्र की क्रोध अग्नि से नर्प  प्रजापतिका सर काटकर तीनो लोको मैं विलीन हो गया था .उसके बाद प्रिय   के  शोक से द्रवित भगवान् शिव सती   के  शव  को कंधे पर लादकर हिमालय की और चल पड़े .ये प्रसंग तीनो लोको  के लिए शोक का कारण बन गया क्योकि स्रष्टि  के संहारक का शोक तीनो लोको को शोकमय किये हुआ था .संसार की भलाई   के लिए भगवान् विष्णु ने सती   के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से कट कट कर भूतभावन  के  शरीर से अलग किया .मान्यता है की जहा जहा माँ सती   के  शरीर   के  अंग प्रत्वी पर पड़े वहा वहा ही माँ जगदम्बा का शक्ति  पीठ बन गया और माँ अनन्य अनेक रूपों मैं भक्तो की पूजनीय बनी .........

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